A deprived child drudging for morsels vows on approval of 'Right to Education'
एक ही तो है यह दुनिया, एक से ही लोग दुनिया में
यही सोचता आया, जबसे लिया जन्म इस जहां में
पर बट रखे हैं यह लोग, सरहदें हैं इस जहां पे
बंध रखा हूँ संग मज़बूरी, आज़ादी है कहाँ पे
यह जो कलम सालों बाद, मेरे हाथों में है आई
मैं कहलाऊंगा अब साक्षर, यह कसम अब है खाई...
जब दिन थे मेरे दूध के, मैं अश्रू पी रहा था
वो कहतें हैं जिसे बचपन, मैं युहीं जी रहा था
सब भुला दूंगा ये यादें, नए देखे हैं अब सपने
इक नयी है किरण, आशा है जो मेरे मन में
हौसले की है अब किताब, हिम्मत की है संग सियाही
यह जो कलम सालों बाद, मेरे हाथों में है आई
मैं कहलाऊंगा अब साक्षर, यह कसम अब है खाई...
कई महल हैं यहाँ पे, आशियाने बन रखें हैं
मेरा तो घर सड़क है, यां फिर झोपड़ तन रखे हैं
बदलूँगा अपनी हालत, यह कर अब प्रण रखे हैं
जड्ड मिटाऊंगा अनपढ़ता, पढने की है लहर आई
यह जो कलम सालों बाद, मेरे हाथों में है आई
मैं कहलाऊंगा अब साक्षर, यह कसम अब है खाई.
नहीं करूँगा यह मजदूरी, न रहेगी यह मज़बूरी
पूरा होगा मेरा सपना, इक मैं भी स्कूल जाऊंगा
भगा अज्ञानता का अँधेरा, रौशनी मैं अब लाऊंगा
लिखूंगा करम मैं अपना, यह आस जाग है आई
यह जो कलम सालों बाद, मेरे हाथों में है आई
मैं कहलाऊंगा अब साक्षर, यह कसम अब है खाई..
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Gurpreet Phull
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